नीतीश कुमार पिछले 17 साल से बिहार के मुख्यमंत्री हैं। रिकॉर्ड नौ बार वे शपथ ले चुके हैं। ये पहला माैका है जब मंत्रिमंडल के विभागों के बंटवारे में 6 दिन का समय लगा। आखिर इसकी वजह क्या है? भाजपा और जदयू के बीच कैसा संतुलन बिठाया गया। कई कयास थे, लेकिन सभी ढह गए। इस बंटवारे में केवल नीतीश कुमार की ही चली। उन्होंने भाजपा को विभाग तो ज्यादा थमा दिए, लेकिन पैसा-पॉवर जदयू के खाते में डाल दिया।
इनमें जो विभाग सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठा का विषय बन गया था, वो था गृह विभाग। इसे पाने की छटपटाहट भाजपा में दिख रही थी। डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी भी जिद कर रहे थे। इसके पीछे की वजह थी- बिहार में एमपी-यूपी मॉडल की तर्ज पर (अपराधियों का एनकाउंटर और संपत्तियों पर बुलडोजर चलवाना) काम करके जनता के बीच भाजपा का स्ट्रांग मैसेज पहुंचाना, लेकिन नीतीश कुमार ने भाजपा की इस प्लानिंग पर फिलहाल पानी फेर दिया है। उन्होंने गृह विभाग इस बार भी नहीं छोड़ा।
बता दें कि बिहार की यही परंपरा भी रही है कि यहां जो सीएम बना, उसी के पास गृह विभाग रहा। नीतीश कुमार के पहले वाले सीएम भी गृह विभाग अपने ही पास रखते आए हैं। उन्होंने इस परंपरा को नहीं तोड़ा। कयास थे कि इस बार भाजपा गृह मंत्रालय ले लेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। ऐसे में भाजपा का बिहार में बुलडोजर चलाने का सपना धरा का धरा रह गया।
अपने मॉडल से ऊपर कोई मॉडल नहीं आने देंगे नीतीश:
नीतीश कुमार कभी भी बिहार में अपने सुशासन वाले मॉडल के ऊपर किसी दूसरे मॉडल को हावी नहीं होने देंगे। देशभर में नीतीश कुमार की छवि सुशासन कुमार के रूप में बनी है। बिहार से क्राइम और जंगल राज को समाप्त करने का क्रेडिट नीतीश कुमार खुद लेते रहे हैं।
2005 से 2010 का दौर था, जब उन्होंने शहाबुद्दीन, अनंत सिंह, रीतलाल यादव और आनंद मोहन जैसे बाहुबलियों समेत 75 हजार से ज्यादा छोटे- बड़े अपराधियों को जेल की हवा खिला दी थी। वो भी बिना किसी एनकाउंटर और बुलडोजर के। हर जिले में फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना हुई, जिनसे 5 साल में लगभग 52 हजार अपराधियों को सजा भी दिलवाई गई।
इसी कारण उनका सुशासन कुमार पड़ा था। उनके इस मॉडल की चर्चा देशभर में हुई, लेकिन हालिया कुछ महीनों में क्राइम को खत्म करने का बीजेपी का जो मॉडल लोकप्रिय हुआ है, वो एनकाउंटर और बुलडोजर का मॉडल है।
भाजपा बिहार में भी इसी मॉडल से खुद को मजबूत करना चाहती थी। मगर खुद को जेपी, लोहिया और कर्पूरी जैसे समाजवादियों का वाहक कहने वाले नीतीश कभी भी अपनी सरकार पर ये आरोप नहीं लगवाना पसंद नहीं करेंगे कि उन्होंने एनकाउंटर और बुलडोजर के दम पर सरकार चलाई।
बिहार में पहली बार विभाग बंटवारे में इतनी देर-
सबसे बड़ा कारण गृह विभाग की खींचतान है। इसके चलते बिहार में पहली बार विभाग का बंटवारा और मंत्रिमंडल विस्तार में इतनी देरी हुई है। इससे पहले 8 बार नीतीश बिहार के सीएम बन चुके हैं और हर बार उन्होंने विभागों का बंटवारा सरकार बनने के बाद या तो उसी दिन या ज्यादा से ज्यादा 4 दिन के भीतर कर लिया।
साथ में मंत्रिमंडल का विस्तार भी, लेकिन इस बार सरकार बनने के बाद 6 दिन तक विभागों का बंटवारा न हो पाने के कारण नीतीश भी अनकंफर्ट हुए और भाजपा के नेता भी। इससे विपक्ष को यह कहने का मौका मिलने लगा कि बिहार में असली खेला अभी बाकी है।
उनका इशारा था- फ्लोर टेस्ट से पहले एनडीए में टूट-फूट होने का। विपक्षी नेताओं की इन बातों को और हवा तब मिली, जब एनडीए का हिस्सा बने जीतनराम मांझी ने दो मंत्री पद की मांग रखते हुए यहां तक कह दिया कि अगर एक मंत्री और न मिला तो यह अन्याय होगा। मैंने महागठबंधन से मिले सीएम पद के ऑफर को ठुकराया है।
छोटे नहीं, बड़ा भाई की भूमिका में ही रहेंगे नीतीश-
मजे की बात यह है कि इस बार कहा जा रहा था कि नीतीश कुमार भाजपा के साथ एडजस्टमेंट करके चलेंगे और हो सकता है कि छोटे भाई की भूमिका में भी आ जाएं, लेकिन गृह समेत महत्वपूर्ण विभाग लेकर नीतीश ने बता दिया कि बिहार में अब भी वे ही सर्वोपरि है।
इस पर राजनीतिक जानकार प्रवीण बागी कहते हैं कि विभागों के बंटवारे से नीतीश ने साफ कर दिया कि बिहार की सियासत में वे जैसा चाहेंगे- वैसा ही होगा। इस बार भी तीन विभागों को छोड़कर बंटवारा उसी तरीके से किया गया है, जैसा 2020 में एनडीए सरकार के दौरान था।
केवल तीन विभाग पशु एवं मत्स्य, पिछड़ा एवं अति पिछड़ा और आपदा प्रबधंन विभाग अलग से भाजपा को दिया गया है। इस बंटवारे में भाजपा के 23 विभागों का बजट 69 हजार 432 करोड़ रुपए है तो जदयू के 19 विभागों का बजट 1 लाख 17 हजार 529 करोड़ रुपए है। यानी अब भी नीतीश कुमार ही बड़े भाई ही बने और भाजपा छोटा भाई।
अब पढ़िए क्या कहते हैं भाजपा नेता…
बिहार को जंगल राज से मुक्त कराना हमारा प्राथमिक प्रयास- बीजेपी
भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष संतोष पाठक ने कहा कि बिहार को जगंल राज से मुक्त कराना हमारा प्राथमिक प्रयास रहा है। उस लक्ष्य पर हमने गंभीरता से पहले भी प्रयास किया है। इस सरकार में भी हमारा ये लक्ष्य रहने वाला है।
हमारे प्रदेश अध्यक्ष और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने कई जगहों पर ये स्पष्ट किया है कि गुंडा तत्व बिहार में समाज को अस्थिर करने का प्रयास करेंगे तो वे नेपाल जाएंगे नहीं तो उनका पिंडदान गया में होने वाला है। हमारा मूल लक्ष्य समाज में सुशासन स्थापित करना है। किस प्रकार से सुरक्षा की भावना विकसित हो सके उस पर काम करना है।
विभाग बंटवारे के बाद भाजपा भी सुशासन की राह पर-
यूपी-एमपी मॉडल पर बिहार भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता कुंतल कृष्णन ने कहा कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी का अभी सिर्फ एक मॉडल है, जंगल राज खत्म करके सुशासन का फिर से स्थापना और बिहार के विकास का मॉडल।
हमारी प्राथमिकता बिहार का विकास और फिर से सुशासन की स्थापना करना है। नियम-कानून के अनुसार सरकार चलाना है। एक तयशुदा फॉर्मूले के तहत मंत्रियों में विभागों का बंटवारा कर दिया गया है। जिससे सरकार का कामकाज सुचारू रूप से चल सके।
भाजपा से टकराव टालना बड़ी चुनौती
ये तय है कि लोकसभा चुनाव तक सब कुछ ठीक ठाक रहेगा, लेकिन जिस तरह से मंत्री बनने के बाद भाजपा के नेताओं ने विभाग बंटवारा तक सरकारी गाड़ियां नहीं ली थी। कहा ये भी जा रहा है कि वापस लौटा दी थी, ऐसे में बंटवारे में कम बजट वाले विभाग से वे खुश नहीं होंगे, लेकिन चूंकि केंद्रीय नेतृत्व का जोर बिहार की लोकसभा की 40 सीटों पर हैं। ऐसे में अभी कुछ नहीं बोलेंगे।
भाजपा के नेताओं के बीच लोकसभा चुनाव के बाद तल्खियां जरूर देखने को मिलेगी। विभाग बंटवारे के बाद एक मंत्री का बयान भी चर्चा में है कि ‘हर अपमान के बाद भी बिहार का विकास करेंगे’। संदर्भ भले ही विभाग का बंटवारा नहीं हो, लेकिन इससे कहीं न कहीं उनकी टीस जरूर नजर आती है। ऐसे में नीतीश के लिए भाजपा और हम के साथ संतुलन बिठाने की चुनौती रहेगी।



